Top 20 female freedom fighters of India[Unsung heroes]

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स्वतंत्रता सेनानी हर देश के इतिहास का अहम हिस्सा होते हैं। ऐसे कई स्वतंत्रता सेनानी हैं जिन्होंने राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। उनमें से ज्यादातर को तो पूरा देश पहचानता है, लेकिन कुछ स्वतंत्रता सेनानी ऐसे भी हैं जिनके बारे में बहुत से लोग नहीं जानते हैं। वे महिला स्वतंत्रता सेनानी हैं।

Here is a list of top 20 female freedom fighters of India  जिन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया।

रानी अब्बक्का

रानी अब्बक्का एक लोकप्रिय रानी सिद्ध हुई। कहा जाता है कि यह उन स्वतंत्रता सेनानियों में अंतिम ज्ञात महिला हैं, जिन्होंने युद्ध में अग्नि तीर का प्रयोग किया।

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जन्म एवं ऐतिहासिक घटनाएं

रानी अब्बक्का का जन्म चोटा वंश में सन 1525 में हुआ था। मातृवंशीय विरासत को ध्यान में रखते हुए रानी  अब्बक्का का इनके चाचा तिरुमाला राय द्वारा राज तिलक कर दिया गया।

सन 1555 में पुर्तगालियों ने एडमिरल डोम अल्वारो दासील्वीरा को रानी से युद्ध करने हेतु भेजा। इस युद्ध में रानी को सफलता हासिल हुई तथा उन्होंने एडमिरल डोम अल्वारो को खदेड़ दिया। सन् 1557 में पुर्तगालियों ने मैंगलोर को अपने कब्जे में ले लिया तथा 1568 में पुनः अपना ध्यान उल्लाल की तरफ केंद्रित किया। एक रात

रानी ने 200 सेना की टुकड़ियों से पुर्तगालियों पर आक्रमण किया। इस आक्रमण में जोआओ पिक्सोटो जो पुर्तगालियों का एक प्रमुख सेनापति था मारा गया तथा अनेक पुर्तगाली सैनिक वापस लौट गए। रानी अब्बक्का ने पुर्तगालियों को मैंगलोर छोड़ने पर विवश कर दिया।

 मृत्यु

1570 में रानी अब्बक्का बीजापुर सुल्तान तथा कालीकट के जमोरिन के साथ गठबंधन में शामिल हुई। जमोरिन ने पुर्तगालियों के खिलाफ युद्ध किया और पुर्तगालियों के खिलाफ युद्ध करते हुए बहुत से पुर्तगाली किलो को नष्ट कर दिया, परंतु युद्ध से लौटते वक्त पुर्तगालियों द्वारा उनकी हत्या कर दी गई। इस हादसे के बाद तथा पति द्वारा विश्वासघात किए जाने के पश्चात रानी का मनोबल टूट गया और वह हार गई। पुर्तगालियों द्वारा उन्हें जेल भेज दिया गया। इस प्रकार रानी अब्बक्का ने अपना पूरा जीवन आजादी की लड़ाई लड़ते हुए तथा अपने साम्राज्य की रक्षा करते हुए बिता दिया । और अपनी जीवन के अंतिम दिन उन्होंने जेल में बिताये ।

वेलु नचियार

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वेलु नचियार एक भारतीय क्रांतिकारी महिला थी। वेलु नचियार 1780 से 1790 के दौरान शिवगंगा रियासत की महारानी थी। वेलु नचियार भारत में अंग्रेजों की परतंत्रता के खिलाफ लड़ने वाली पहली वीरांगना थी |

जन्म एवं ऐतिहासिक घटनाएं

वेलु नचियार का जन्म 3 जनवरी 1730 को रामानाथपुरम नामक स्थान पर हुआ था। वेलु नचियार का राजतिलक 1780 में किया गया। वेलु नचियार अपने माता-पिता की इकलौती संतान थी। इनके पति का नाम मुथु वदुगनाथ पेरियावुदया थिवारी था। तमिल कि लोग उन्हें वीरमंगई के नाम से भी जानते हैं। रानी वेलु नचियार हथियारों का उपयोग, वलारी, सीलम्बन, घुड़सवारी और तीरंदाजी जैसे कार्यों में प्रशिक्षित थी। ब्रिटिश के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाली पहली रानी के रूप में विख्यात हुईं।

मृत्यु

वेलु नचियार की मृत्यु 1796  में हुई थी। उसके पहले रानी ने 10 साल से भी अधिक समय तक शिवगंगा पर शासन किया। उनकी याद में 31 दिसंबर 2008 को एक डाक टिकट भी जारी किया गया था।

झलकारी बाई

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झलकारी बाई रानी लक्ष्मीबाई की सेना में महिला शाखा दुर्गा दल कि सेनापति थी

जन्म एवं ऐतिहासिक घटनाएं

झलकारी बाई का जन्म 22 नवंबर 1830 को झांसी में हुआ था। झलकारी बाई एक भारतीय स्वतंत्रता सेनानी थी। लॉर्ड डलहौजी के राज्य हड़पने की नीति के विरोध में रानी लक्ष्मीबाई के साथ झलकारी बाई ने अंग्रेजों की इस कूटनीति के विरुद्ध लड़ाई लड़ी। झलकारी बाई नेतृत्व क्षमता में निपुण थी तथा एक सशक्त साहसी महिला थी।  

मृत्यु

4 अप्रैल 1857 को झांसी में ही झलकारी बाई की युद्ध के दौरान मृत्यु हो गई। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा झलकारी बाई के सम्मान में उनकी एक प्रतिमा आगरा में स्थापित की गई है।

मातंगिनी हाजरा

मातंगिनी-हाजरा

मातंगिनी हाजरा

जन्म एवं ऐतिहासिक घटनाएं

मातंगिनी हाजरा का जन्म पूर्वी बंगाल के मिदनापुर जिले में एक निर्धन परिवार में हुआ था। 12 वर्ष की आयु में इनका विवाह 62 वर्षीय विधुर त्रिलोचन हाजरा से कर दिया गया। कुछ दिनों पश्चात इनके पति की मृत्यु हो गई तथा उनके पहले पत्नी के पुत्रों द्वारा श्रीमती हाजरा को निष्कासित कर दिया गया। मातंगिनी हाजरा ने मजदूरी का सहारा लिया तथा जीवन यापन करने लगी। 1932 मैं गांधी जी के नेतृत्व में चलाए जाने वाले आंदोलनों में इन्होंने हिस्सा लिया। 8 सितंबर को तीन सेनानियों की मृत्यु के बाद जब अंग्रेजों के विरुद्ध में बड़ी बड़ी रैलियां आयोजित की गई उस समय मातंगिनी हाजरा ने 5000 लोगों को तैयार किया।

मृत्यु

 विरोधी रैली का हिस्सा बनी मातंगिनी हाजरा लोगों की भीड़ को संबोधित कर रही थी। तभी वहां पर पुलिस की गोलियां चलने लगी। एक हाथ में गोली लगने के उपरांत मातंगिनी ने ध्वज को दूसरे हाथ में उठा लिया तथा फिर दूसरे हाथ पर गोली लगी तथा तीसरी गोली सर पर लगने से इनका मृत शरीर जमीन पर गिर पड़ा।

गुलाब कौर

गुलाब-कौर

गुलाब कौर उन महिलाओं में से एक हैं जिन्होंने देश हित के लिए स्वहित का त्याग किया था।  गुलाब कौर अपना सर्वस्व छोड़कर भारत के आजादी की लड़ाई में शामिल होने भारत लौटी थी।

जन्म एवं ऐतिहासिक घटनाएं

गुलाब कौर का जन्म बक्शीवाला गांव में 1890 में पंजाब के अंतर्गत संगरूर जिले में एक सामान्य परिवार में हुआ था। गुलाब कौर के पति का नाम मानसिंह था। एक बेहतर जीवन यापन के लिए मानसिंह अपनी पत्नी गुलाब कौर के साथ भारत छोड़ फिलीपींस में बसने के लिए चले गए। गुलाब तथा उनके पति अमेरिका जाना चाहते थे परंतु कुछ कारणों से गुलाब कौर मनीला में रुकना पड़ा। इसी दौरान गदरी देशभक्तों का जहाज मनीला पहुंचा। उनके सत्याग्रह को देखकर गुलाब कौर तथा अन्य लोग बहुत प्रभावित हुए और अमेरिका जाने का विचार त्याग कर स्वदेश लौटने का निर्णय लिया। स्वदेश लौटने की बात मानसिंह को अच्छी नहीं लगी। तब साहसी महिला गुलाब गौर ने अपने पति मानसिंह का त्याग कर स्वदेश लौटने का निर्णय लिया तथा भारत आकर स्वाधीनता की लड़ाई में सम्मिलित हुईं। गुलाब कौर गदर पार्टी का प्रचार-प्रसार करती तथा लोगों को गदर पार्टी के बारे में बताती थी। इन्होंने वेश बदलकर गदर पार्टी के कार्यकर्ताओं को हथियार मुहैया कराएं। अंग्रेजी शासकों द्वारा इन पर कड़ी नजर रखी गई तथा इन्हें कारावास की सजा सुनाई गई।

मृत्यु

गुलाब कौर को देशद्रोह के जुर्म में लाहौर की जेल शाही किला में अमानवीय यातनाओं का सामना करना पड़ा। परंतु गुलाब ने कोई भी गुप्त बात अंग्रेजी शासकों से नहीं बताई। सजा पूरी होने के बाद यह महान महिला होशियारपुर में रहकर अपना जीवन यापन करने लगी तथा 1931 में अपने इस जीवन से मुक्त हो गई।

चकली इलम्मा

चकली-इलम्मा

चकली इलम्मा का प्रारंभिक नाम चित्याला इलम्मा था। चकली इलम्मा उन महिलाओं में से एक थी जिन्होंने अराजकता के खिलाफ आवाज उठाई थी।

जन्म एवं ऐतिहासिक घटनाएं

चकली इलम्मा का जन्म 1895 को कृष्णापुरम, तेलंगाना में हुआ था। चकली इलम्मा अपने माता-पिता की पांचवी संतान थी। 11 वर्ष की अवस्था में चकली इलम्मा का विवाह चित्याल नरसिमा से कर दिया गया। चकली व चित्याल के 5 संताने थी। इलम्मा ने 1940 से 1944 तक अराजकता के खिलाफ आवाज उठाया। चकली इलम्मा आंध्र महासभा तथा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता हासिल की।

मृत्यु

10 सितंबर 1985 को बीमारी के कारण चकली इलम्मा उर्फ चित्याला इलम्मा की मृत्यु हो गई।

पद्मजा नायडू

पद्मजा नायडू जानी मानी भारतीय राजनीतिज्ञ सरोजिनी नायडू की पुत्री थी। सरोजिनी नायडू की भांति ही पद्मजा नायडू ने भी अपना जीवन दूसरों के हित में समर्पित कर दिया।

जन्म एवं ऐतिहासिक घटनाएं

पद्मजा नायडू का जन्म 17 नवंबर 1900 में हुआ था। इनकी माता का नाम सरोजिनी नायडू तथा पिता का नाम डॉक्टर यम गोविंदराजलू था। पद्मजा नायडू एक स्वतंत्रता सेनानी थी साथ ही पश्चिम बंगाल की प्रथम महिला राज्यपाल थी। 1942 में महात्मा गांधी द्वारा चलाए जा रहे आंदोलन में हिस्सा लेने के कारण पद्मजा नायडू को जेल जाना पड़ा। पद्मजा नायडू ने राष्ट्रहित में अनेक योगदान दिए हैं। सन 1962 में पद्मजा नायडू को पद्मा विभूषण से सम्मानित किया गया था।  21 वर्ष की आयु में पद्मजा नायडू को हैदराबाद में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की संयुक्त संस्थापिका बनाया गया।

मृत्यु

देश के लिए समर्पित पद्मजा नायडू की मृत्यु 2 मार्च 1975 में हुई। पद्मजा नायडू के सम्मान में दार्जिलिंग स्थित पद्मजा नायडू हिमालयन प्राणी उद्यान की स्थापना हुई।

तारकेश्वरी सिंहा

तारकेश्वरी सिंहा सामान्य परिवार में जन्मी एक साधारण लड़की थी। जिन्होंने हमारे समाज के लिए कई कल्याणकारी कार्य किए हैं। तारकेश्वरी सिन्हा एक राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में भी जानी जाती हैं।

जन्म एवं ऐतिहासिक घटनाएं

तारकेश्वरी सिंहा का जन्म 26 दिसंबर 1926 को तुलसीगढ़ बिहार में हुआ था। गांधी जी द्वारा चलाए जाने वाले भारत छोड़ो आंदोलन Quit India movement में इन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1952 में तारकेश्वरी  ने पहली बार चुनाव लड़ा। तत्पश्चात तारकेश्वरी 1957, 1962 तथा 1967 में लोकसभा के लिए चुनी गई। इन्होंने नेहरू जी के साथ 1958 से 1964 तक उप वित्त मंत्री के रूप में काम किया। सामाजिक कार्यों में भी तारकेश्वरी की अहम भूमिका है। इन्होंने अपने भाई की स्मृति में तुलसीगढ में अस्पताल का निर्माण करवाया। जहां मुफ्त इलाज की सुविधा उपलब्ध है।

मृत्यु

80 साल की उम्र में सामाजिक कार्यों में संलिप्त रहने वाली, पहले उप वित्त मंत्री तारकेश्वरी सिन्हा की 14 अगस्त 2007 में मृत्यु हो गई।

अरूणा आसफ अली

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अरुणा आसफ अली का असली नाम अरुणा गांगुली था। यह बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि थी। अरूणा आसफ अली एक स्वतंत्रता सेनानी थी।

जन्म एवं ऐतिहासिक घटनाएं

इनका जन्म बंगाली परिवार में 19 जुलाई 1909 को हरियाणा में हुआ था। उन्होंने अपने कार्मिक जीवन की शुरुआत अध्यापन कार्य से की थी। इन्होंने कुछ व्यक्तिगत सत्याग्रह भी किए जिनके लिए उनको जेल भी जाना

पड़ा था। इन्होंने अपने राजनीतिक संघर्ष की शुरुआत नमक सत्याग्रह के समय की थी। 1 साल जेल में बिताने के बाद गांधी इरविग समझौता के बाद सभी कैदियों को रिहा कर दिया गया परंतु अरूणा आसफ अली को नहीं। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान 1942 में गोवालीया टैंक मैदान में राष्ट्रीय ध्वज फहराकर इन्होंने सभा की अगुवाई की। सरकार द्वारा उनकी संपत्ति जब्त कर ली गई तथा उनको पकड़वाने पर 5000 का इनाम भी रखा गया था । अरुणा आसफ अली ने इंकलाब नामक पत्रिका का संपादन किया।

मृत्यु

29 जुलाई 1997 को दिल्ली में इनका निधन हो गया। मरणोपरांत अरुणा आसफ अली को भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

सुभद्रा कुमारी

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सुभद्रा कुमारी का पूरा नाम सुभद्रा कुमारी चौहान है। सुभद्रा कुमारी चौहान एक भारतीय कवयित्री थी । जिनकी लोकप्रिय कविता है झांसी की रानी।

जन्म एवं ऐतिहासिक घटनाएं

 सुभद्रा कुमारी का जन्म 16 अगस्त 1904 निहालपुर गांव इलाहाबाद में हुआ था। इन्होंने छोटी उम्र से ही कविताएं लिखना प्रारंभ कर दिया था। 1913 में जब सुभद्रा कुमारी सिर्फ 9 साल की थी तभी उनकी पहली कविता प्रकाशित हुई थी। 1919 इनका विवाह ठाकुर लक्ष्मण सिंह से हुआ। 1920 से 1921 तक सुभद्रा कुमारी तथा लक्ष्मण सिंह अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य थे। 1922 में झंडा सत्याग्रह के दौरान सुभद्रा कुमारी चौहान प्रथम महिला सत्याग्रही थी। उन्होंने स्वतंत्र से जुड़े सभी आंदोलनों में हिस्सा लिया।  इन के दो रूप देखने को मिले। पहले इनकी पहचान एक देश सेविका के रूप में विख्यात हुई। तथा दूसरी देशभक्ति कवयित्री के रूप में लोगों के हृदय में विराजमान हुईं। सुभद्रा कुमारी चौहान की कुछ प्रमुख रचनाएं इस प्रकार हैं-बिखरे मोती, उन्मादिनी तथा सीधे-साधे चित्र।

मृत्यु

44 वर्ष की अवस्था में फरवरी 1948 को यात्रा के दौरान एक कार दुर्घटना में सुभद्रा कुमारी चौहान की मृत्यु हो गई।

दुर्गावती देवी

दुर्गावती-देवी

भारत के इतिहास में दुर्गावती देवी का नाम दुर्गा भाभी के रूप में भी विख्यात है।  भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों में  दुर्गावती देवी भी शामिल थी।

जन्म एवं ऐतिहासिक घटनाएं

दुर्गावती देवी का जन्म 7 अक्टूबर 1907 को प्रदेश के शहजादपुर गांव में हुआ था। दुर्गावती देवी क्रांतिकारी भगवती चरण वोहरा की पत्नी थी।  दुर्गावती देवी एक सशक्त क्रांतिकारी महिला थी। कहां जाता है भारत को आजाद कराने के लिए दुर्गा भाभी ने बम बनाना सीख भी सीख लिया था। आजादी की लड़ाई में भगत सिंह तथा लाला लाजपत राय और दुर्गावती देवी एक साथ शामिल थे। कुछ स्वतंत्रता सेनानियों जिसमें भगत सिंह तथा उनके कुछ मित्र थे उनको जेल से छुड़ाने के लिए दुर्गावती देवी ने अपने गहने भी बेच दिए थे। दुर्गावती देवी ने लॉर्ड हैली को मार डालने की धमकी भी दी थी।

मृत्यु

 हिंदुस्तानी समाज वर्ग से जुड़ी महिला दुर्गावती देवी का निधन 92 वर्ष की उम्र में 15 अक्टूबर 1999 मे हुआ था।

अक्कम्मा चेरियन

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अक्कम्मा  चेरियन केरल में एक स्वतंत्रता सेनानी महिला थी। त्रावणकोर की (केरल) रानी लक्ष्मीबाई के नाम से भी जानते हैं।

जन्म एवं ऐतिहासिक घटनाएं

अक्कम्मा चेरियन का जन्म 14 फरवरी सन 1909 को त्रावणकोर के कंजिरपल्ली में हुआ था। अक्कम्मा चेरियन ने सविनय अवज्ञा आंदोलन में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। राज्य कांग्रेस के 12वीं सदस्य के रूप में भी इनका नाम अंकित है। अक्कम्मा चेरियन ने कौडियार महल तक की रैली में भी हिस्सा लिया। कौडियार रैली में इनकी सहभागिता से प्रभावित होकर महात्मा गांधी ने इन्हें रानी लक्ष्मीबाई की उपाधि दी। इसके पश्चात चेरियन ने देश सेविका संघ का गठन किया। इसके साथ ही उन्होंने राज्य कांग्रेस का वार्षिक सम्मेलन आयोजित किया तथा भारत छोड़ो आंदोलन का हिस्सा बनी।

मृत्यु

 5 मई 1982 को अक्कम्मा चेरियन की मृत्यु हो गई। इन के सम्मान में तिरुवंतपुरम में एक प्रतिमा स्थापित है तथा इनके जीवन की गाथाओं पर एक फिल्म भी बनाई गई है।

दुर्गाबाई देशमुख

आयरन लेडी के नाम से जानी जाने वाली दुर्गाबाई देशमुख एक महान स्वतंत्रता सेनानी थी। स्वतंत्र भारत के पहले वित्त मंत्री चिंतामनराव देशमुख की पत्नी थी।

जन्म एवं ऐतिहासिक घटनाएं

आंध्र प्रदेश के स्वतंत्रता संग्राम में सबसे पहले हिस्सा लेने वाली महिला दुर्गावती देशमुख का जन्म 9 जुलाई 1909 को राजमंड्री जिले के काकीनाडा गांव में हुआ था। दुर्गावती देशमुख ब्रिटिश शासक के विरुद्ध युद्ध में महात्मा गांधी की अनुयाई थी। एक सत्याग्रही तथा समाज सुधारक महिला थे। भारतीय स्वतंत्रता के लिए की जाने वाली सत्याग्रह में हिस्सा लेने के लिए इन्हें तीन बार जेल जाना पड़ा था। 1946 में दुर्गाबाई देशमुख संविधान सभा के सदस्य के रूप में चुनी गई। 1948 में उन्होंने आंध्र एजुकेशन सोसाइटी की स्थापना की। जो बच्चों की शैक्षिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बनाया गया है। दुर्गावती देशमुख ने अपना पूरा जीवन एक सामान्य स्त्री की तरह समाज की सेवा करने में बिताया।

मृत्यु

उनके अपूर्व योगदान  को सम्मानित करते हुए भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण  से सम्मानित किया। 9 मई 1981 को इस महान स्वतंत्रता सेनानी की मृत्यु हो गई।

पार्वती गिरी

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पार्वती गिरी भी एक स्वतंत्रता सेनानी थी। पार्वती गिरी मात्र 11 वर्ष की अवस्था में भारत को स्वतंत्र कराने के लिए निकल पड़ी। इन्हें पश्चिमी उड़ीसा के मदर टेरेसा के नाम से भी जाना जाता है।

जन्म एवं ऐतिहासिक घटनाएं

भारत के बहादुर नारी पार्वती गिरी का जन्म 19 जनवरी 1926 में पश्चिमी उड़ीसा में हुआ था। पार्वती गिरी के पिता तथा चाचा एक जाने-माने स्वतंत्रता सेनानी थे। पिता तथा चाचा की बातों से तथा उनकी बहस से प्रभावित होकर पार्वती  भी स्वतंत्रता सेनानी की राह पर चलने का निर्णय लिया। पार्वती गिरि ने कक्षा तीन में ही स्कूल छोड़ दिया तथा महात्मा गांधी के अनुयाई बन गई। आजादी मिलने के बाद पार्वती गिरी ने समाज सेवा में अपना समय व्यतीत किया। उन्होंने एक अनाथालय की स्थापना की जहां पर अनाथ बच्चों और महिलाओं को आश्रय दिया जा सके। इनके सफल योगदान के लिए 1998 में इन्हें डॉक्टरेट की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया था।

मृत्यु

अपना सारा जीवन देश सेवा एवं परोपकार के लिए न्यौछावर कर देने के बाद पार्वती गिरी ने 17 अगस्त 1995 को मृत्यु को गले लगा लिया।

स्नेहलता वर्मा

भारत देश की आजादी के लिए कई लोगों ने स्वतंत्रा सेनानी के रूप में अपनी जीवन व्यतीत किया है। बिजोलिया क्षेत्र का वर्मा परिवार भी देश की आजादी तथा नारी के उत्थान के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया ‌। उन्हीं परिवारों में से एक महिला थी स्नेहलता वर्मा।

जन्म एवं ऐतिहासिक घटनाएं

स्नेहलता का जन्म सन 1944 को हुआ था। स्नेह लता के पिता एक स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने अनेक आंदोलनों में हिस्सा लिया तथा नारी उत्थान के क्षेत्र में भी कार्य किया। स्वतंत्रता सेनानी होने के नाते स्नेह लता के पिता को 22 सालों तक जेल में रहना पड़ा। उनके वापस आने के बाद स्नेह लता उनसे प्रभावित हुई तथा एक आंदोलनकारी महिला बनी। ब्रिटिश शासकों द्वारा स्नेह लता के परिवार को 1931 से 1934 तक नजरबंद रखा गया था।  स्नेह लता ने इससे हिम्मत नहीं हारी तथा हिंदुस्तान की आजादी के लिए अपनी लड़ाई जारी रखी। उन्होंने अपने जीवन काल में महिला आश्रम तथा शिक्षण संस्थानों की भी स्थापना की।

मृत्यु

स्नेह लता की मृत्यु 2018 में देश सेवा तथा नारी उत्थान से जुड़े कार्य करते हुए हो गई।

रानी गाइदिनल्यू

रानी गाइदिनल्यू को रानी गीडालू के रूप में भी जाना जाता है। रानी भारत की आध्यात्मिक एवं राजनीतिक नेताओं में से थी

जन्म एवं ऐतिहासिक घटनाएं

रानी का जन्म रांगमई मणिपुर में हुआ था। वह शुरू से ही स्वतंत्र तथा स्वाभिमानी विचारों वाली महिला थी। मात्र 13 वर्ष की कम आयु में ही रानी गीडालु अपने चचेरे भाई जादोनांग के हेराका धार्मिक आंदोलन में शामिल हो गई। आगे चलकर यह आंदोलन एक राजनीतिक आंदोलन में बदल गया।16 साल की अवस्था में रानी को अंग्रेजों द्वारा पकड़ लिया गया तथा आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। इन से प्रभावित होकर नेहरू ने रानी गाइदिनल्यू को क्वीन की उपाधि से सम्मानित किया। इनकी कार्य को सराहनीय बताते हुए भारत सरकार ने रानी को पद्मभूषण पुरस्कार से सम्मानित किया।

मृत्यु

78 वर्ष की अवस्था में रानी अपने गांव लौट आई। जहां 17 फरवरी 1993 को इनकी मृत्यु हो गई।

सुचेता कृपलानी

सुचेता-कृपलानी

सुचेता कृपलानी एक भारतीय स्वतंत्रता सेनानी थी तथा एक राजनीतिक महिला थी। इनका मूल नाम सुचेता मजुमदार था। यह भारत की प्रथम महिला मुख्यमंत्री बनी।

जन्म एवं ऐतिहासिक घटनाएं

सुचेता कृपलानी का जन्म 25 जून 1908 को अंबाला पंजाब में हुआ था। इनके पति का नाम जे बी कृपलानी था। इन्हें उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में सर्वाधिक जाना गया। सुचेता कृपलानी भारत की प्रथम महिला मुख्यमंत्री के रूप में चुनी गई थी।  इसके साथ ही सुचेता कृपलानी बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में इतिहास की प्राध्यापिका थी।

निसंतान होने के कारण सुचेता कृपलानी ने अपना सारा धन लोक कल्याण समिति को दान कर दिया। सुचेता कृपलानी उन महिलाओं में से एक हैं जिन्होंने स्वतंत्र भारत के लिए देखे गए सपने को सच करने के लिए महात्मा गांधी का संपूर्ण साथ दिया।

मृत्यु

 जीवन के अंतिम दिनों में सुचेता कृपलानी का स्वास्थ्य गिरता गया तथा हृदय गति रुकने के कारण 1 दिसंबर 1974 को इनकी मृत्यु हो गई।

उषा मेहता

उषा-मेहता

उषा मेहता भी भारत को स्वतंत्र कराने वाली महिलाओं में से एक बहादुर महिला थी। उषा मेहता भारत छोड़ो आंदोलन के समय खुफिया रेडियो चलाने के लिए पूरे देश में विख्यात हुई थी।

जन्म एवं ऐतिहासिक घटनाएं

उषा मेहता का जन्म 25 मार्च 1920 को सूरत के एक गांव में हुआ था। उषा मेहता का परिचय मात्र 5 वर्ष की अवस्था में महात्मा गांधी से हुआ। महात्मा गांधी ने उनके गांव के समीप शिविर लगाया, जिससे बापू से प्रेरित होकर उषा मेहता ने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने का प्रण लिया। अपने जीवन काल में उषा हमेशा महात्मा गांधी से जुड़ी रही। आजादी मिलने के बाद भी उसे ने गांधीवादी विचारों को आगे बढ़ाया तथा महिलाओं को सशक्त बनने का संदेश दिया। 14 अगस्त 1942 को इन्होंने खुफिया कांग्रेस रेडियो की स्थापना की जिसमें महात्मा गांधी जैसे महत्वपूर्ण व्यक्तित्व के संदेश जनता तक पहुंचाए जाते थे। 3 माह के प्रसारण के बाद अंग्रेज शासकों द्वारा उषा मेहता एवं उनके सहयोगियों को पकड़ लिया गया तथा इन्हें सजा सुनाई गयी।

मृत्यु

इस महान महिला उषा मेहता की मृत्यु 11 अगस्त सन 2000 में हुई। भारत सरकार ने इन्हें इनके कार्यो के लिए पद्मभूषण से सम्मानित किया।

बिश्र्नी देवी शाह

बिश्र्नीदेवी-शाह

जन्म एवं ऐतिहासिक घटनाएं

बिश्र्नी देवी का जन्म 12 अक्टूबर 1902 को बागेश्वर में हुआ था। उत्तराखंड से शामिल महिला स्वतंत्रता सेनानियों की सूची में बिश्र्नी देवी ने अपना नाम शामिल किया है। बिश्र्नी देवी 16 वर्ष की कम आयु में विधवा होने के बाद समाज की कुरीतियों से ना डर कर स्वतंत्रता की लड़ाई में शामिल होने के लिए निकल पड़ी थी। इन्होंने सिर्फ चौथी कक्षा तक पढ़ाई की थी। पति की मृत्यु के बाद इनका जीवन अपने देश की स्वतंत्रता के लिए कार्य करने में व्यतीत हुआ। बिश्र्नी देवी राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन से जुड़ी रही। तथा देश की स्वतंत्रता में अमूल्य योगदान दिया।

मृत्यु

24 मई 1930 में अल्मोड़ा में झंडा फहराने के लिए जुड़ने वाली प्रथम महिला थी। राष्ट्रीय आंदोलनों में संलिप्त रहने के कारण इन्हे जेल भी जाना पड़ा। वर्ष 1974 में भारत देश ने अपने इस अमूल्य निधि को खो दिया।

तिलेश्वरी बरूआ

तिलेश्वरी बरुआ अपने माता-पिता के चार संतानों में से पहली संतान थी। उनके पिता का नाम भाबाकांता बरुआ था। तिलेश्वरी बरुआ का जन्म ढेकियाजुली के निज बोरगांव में हुआ था। तिलेश्वरी बरुआ वह बच्ची थी जो कांग्रेस स्वयंसेवकों के मुख से राष्ट्रभक्ति गीत से प्रभावित थी। 20 सितंबर सन 1942 में तिलेश्वरी ने एक जुलूस में हिस्सा लिया जिसमें तिलेश्वरी ने कुछ स्वतंत्रता सेनानियों के साथ मिलकर पुलिस स्टेशन पर तिरंगा फहराने की कोशिश की थी। इसके लिए तिलेश्वरी को मात्र 12 वर्ष की अवस्था में गोली मार दी गई थी। 20 सितंबर के दिन को असम के सोनितपुर जिले में तिलेश्वरी की मृत्यु शहीद दिवस के रूप में जाना जाता है।

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